रमेश पोवार की कहानी: 470 विकेट लेने वाले भारतीय क्रिकेट का अनोखा सफर

एक बात बताओ भाई, जब टीवी पर क्रिकेट का मैच चलता है, तो तुम्हारी नजर सबसे पहले किस पर जाती है? विराट कोहली, रोहित शर्मा या फिर कोई ऐसा बल्लेबाज जो गेंद को खेतों के पार पहुंचा दे? ज्यादातर लोगों का जवाब बल्लेबाज ही होगा। गांव में भी अगर कोई लड़का बल्ला लेकर निकल जाए तो उसकी अकड़ देखने लायक होती है। बल्ला कंधे पर रखकर ऐसे चलता है, जैसे आईपीएल की नीलामी में करोड़ों रुपए लेकर आया हो।

मगर भैया, क्रिकेट की असली कहानी सिर्फ चौके छक्को कि नहीं होती कभी-कभी एक गेंदबाज भी ऐसा आता है, जो बल्लेबाजों की सारी अकड़ निकाल देता है। बल्लेबाजों के आंखों के सामने घूमती हुई वॉल को फेककर बल्लेबाजों का विकेट ले उड़ता है।

आज हम बात करने जा रहे हैं रमेश पोवर की। एक ऐसे भारतीय क्रिकेटर की, जिनका नाम आज की नई पीढ़ी के युवा क्रिकेट प्रेमियों को शायद तुरंत याद ना आए। मगर घरेलू क्रिकेट में उनकी मेहनत,और बाद में भारतीय महिला क्रिकेट टीम के कोच के रूप में उनकी भूमिका को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता।

तो चलो भैया, चारपाई खींच कर बैठ जाओ। चाय का गिलास पकड़ लो और सुनो रमेश पोवार की कहानी। इसमें क्रिकेट भी है, संघर्ष भी है और जिंदगी का एक ऐसा सबक भी है, जो गांव के किसी लड़की लड़के से लेकर बड़े शहर में रहने वाले खिलाड़ी तक, हर किसी के काम आ सकता है।

मुंबई से शुरू हुआ क्रिकेट का सफर

रमेश राजाराम पोवार का जन्म 19 मई 1978 को मुंबई, महाराष्ट्र में हुआ था। वह दाएं हाथ से बल्लेबाजी करते थे और दाएं हाथ से ऑफ स्पिन गेंदबाजी करते थे। आगे चलकर वहीं गेंदबाजी उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी। अब देखो भाई, मुंबई कोई छोटा मोटा शहर नहीं है। वहां जिंदगी की रफ्तार भी तेज है और मुकाबला भी जबरदस्त क्रिकेट में आगे बढ़ना हो, तो सिर्फ मन मे सपना रखने से काम नहीं चलता। लगातार अभ्यास करना पड़ता है और अपनी जगह बनाने के लिए मैदान पर प्रदर्शन भी दिखाना पड़ता है।

रमेश पोवार ने घरेलू क्रिकेट में मुंबई की तरफ से खेलते हुए अपनी पहचान बनाई वह उन खिलाड़ियों में से थे, जिन्होंने एक दो मैच में चमक दिखाकर नहीं, वल्कि लंबे समय तक घरेलू क्रिकेट खेल कर अपनी उपयोगिता साबित की।

उनकी कहानी का पहला सबक यही है। बड़े मंच पर पहुंचने से पहले छोटे बड़े मुकाबले में खुद को साबित करना पड़ता है। गांव की भाषा में कहे तो खेत में हल चलाए बिना सफल नहीं उगती और घरेलू क्रिकेट में पसीना बहाय बिना टीम इंडिया की टोपी नहीं मिलती।

घरेलू क्रिकेट में ऐसा काम किया कि चयनकर्ताओ का ध्यान गया

भाई, अब यहां एक बात समझो। भारत में क्रिकेट खेलने वालों की कमी नहीं है। गली मोहल्ले से लेकर बड़े-बड़े मैदाने तक हजारों खिलाड़ी बल्ला और गेंद लेकर उतरते हैं। लेकिन उन सब में चुनिंदा खिलाड़ियों को ही देश के लिए खेलने का मौका मिलता है। रमेश पोवार ने घरेलू क्रिकेट में अपनी ऑफ स्पिन गेंदबाजी से लगातार विकेट लिए। प्रथम श्रेणी क्रिकेट में उन्होंने 148 मैच खेले और कुल 470 विकेट अपने नाम किए। बल्लेबाजी में भी वह बिल्कुल खाली हाथ नहीं थे उनके नाम 4245 रन दर्ज हैं,जिनमे 7 शतक भी शामिल है।

अब जरा सोचो, एक ऐसा खिलाड़ी जो गेंद से विकेट भी निकाल रहा हो और जरूरत पड़ने पर बल्ले से भी रन बना रहा हो, उसकी टीम में कितनी अहमियत होगी! गांव की टीम में भी ऐसा खिलाड़ी मिल जाए, तो कप्तान की आधी चिंता खत्म हो जाती है। बल्लेबाजी में कोई जल्दी आउट हो गया तो यह रन बना देगा और गेंदबाजी में विकेट नहीं मिल रहे तो कप्तान इसकी तरफ गेंद बड़ा देगा।

रमेश पोवर की खासियत भी यही थी। वह सिर्फ गेंद फेंकने वाले खिलाड़ी नहीं थे, बल्कि एक उपयोगी ऑलराउंडर थे। उनके घरेलू रिकार्ड बताते हैं कि भारतीय टीम में पहुंचने से पहले उन्होंने लंबे समय तक मेहनत की थी। उनका सफर हमें यह भी बताता है कि अगर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में नाम बनाना है, तो घरेलू क्रिकेट को छोटा समझने की गलती नहीं करनी चाहिए।

आखिरकार आया टीम इंडिया का बुलावा

घरेलू क्रिकेट में मेहनत करने के बाद रमेश पोवार को भारत की तरफ से खेलने का मौका मिला। उन्होंने 16 मार्च 2004 को पाकिस्तान के खिलाफ पहला वनडे अंतरराष्ट्रीय मैच खेला भैया, जरा उस पल की कल्पना करो। जिस खिलाड़ी ने मैदान पर न जाने कितने दिन पसीना बहाया हो। उसे एक दिन देश की जर्सी पहनने का मौका मिले। परिवार दोस्त और जान पहचान वाले सब खुश हो उस एहसास को शब्दों में बताना आसान नहीं है

लेकिन टीम इंडिया में पहुंच जाना मंजिल नहीं, बल्कि एक नई परीक्षा की शुरुआत होती है। यहां हर मैच में प्रदर्शन का दबाव रहता है। कभी बल्लेबाज चल जाते हैं, कभी गेंदबाज चमकते हैं और कभी किसी खिलाड़ी को टीम से बाहर भी बैठना पड़ता है। रमेश पोवर के साथ भी अंतरराष्ट्रीय करियर में उतार-चढ़ाव रहे। उन्होंने भारत की तरफ से कुल 31 वनडे मैच खेले और 34 विकेट लिए। वनडे क्रिकेट में उनका सर्वश्रेष प्रदर्शन तीन विकेट पर 24 रन रहा।

अब यह मत समझ लेना कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में हर गेंद पर विकेट मिल जाता है। अरे भाई, अगर ऐसा होता तो गांव का हर दूसरा लड़का गेद उठाकर सीधा वर्ल्ड कप खेलने पहुंच जाता। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में गेंदबाज को बल्लेबाज की ताकत, पिचका मिजाज और मैच की स्थिति सब समझनी पड़ती है। रमेश पोवार मैं बहुत सारी खूबी थी।

ऑफ स्पिन गेंदबाजी में क्या खास बात थी

क्रिकेट में तेज गेंदबाज अपनी रफ्तार से बल्लेबाज को परेशान करता है। लेकिन स्पिन गेंदबाज का खेल थोड़ा अलग होता है। उसे बल्लेबाज के दिमाग से खेलना पड़ता है। ऑफ स्पिन में गेम आमतौर पर दाएं हाथ के बल्लेबाज के लिए ऑफ साइट से लेफ्ट साइड की तरफ होती है। गेंद कितनी घूमेगी, कितनी उलेगी और बल्लेबाज किस दिशा में शॉट खेलेगा इन सब का असर पड़ता है।

रमेश पोवार दाएं हाथ की ऑफ स्पिनर थे। उनकी भूमिका खास कर उन परिस्थितियों में हम हो जाती थी, जहां स्पेन गेंदबाजी से रन रोकने और विकेट निकालने की जरूरत होती थी।

जरा गांव का एक उदाहरण लो। खेत के किनारे चार लड़के क्रिकेट खेल रहे हैं। बल्लेबाज सोच रहा है कि अगली गेद पर लंबा छक्का मारूंगा। गेंदबाज ने गेंद फेंकी बल्लेबाज ने बल्ला घुमाया और गेंद बल्ले से दूर निकल गई। अब बल्लेबाज कहेगा, अरे यार यह गेंद गई किधर। बस भाई, स्पेन का मजा ही यही है। गेंदबाज सिर्फ हाथ नहीं घूमता, बल्लेबाज को सोचने पर मजबूर करता है।

हालांकि किसी भी गेंदबाज की सफलता सिर्फ गेंद घूमने से तय नहीं होती। सही लाइन सही लेंथ, और धैर्य और बल्लेबाज की कमजोरी पहचाना भी जरूरी है। रमेश पोवार की लंबी घरेलू क्रिकेट यात्रा इस बात का उदाहरण है की स्पिन गेंदबाज के लिए लाइन लेंथ अहम होती है।

टेस्ट क्रिकेट में भी मिला भारत की तरफ से खेलने का मौका

वनडे क्रिकेट के बाद रमेश पोवाल को भारत की तरफ से टेस्ट खेलने का भी मौका मिला। उन्होंने अपना टेस्ट डेब्यू 18 मई 2004 को बांग्लादेश के खिलाफ किया था। और अपने अंतरराष्ट्रीय करियर में कुल दो टेस्ट मैच खेले। टेस्ट क्रिकेट को क्रिकेट का सबसे धैर्य वाला प्रारूप कहा जाता है। यहां बल्लेबाज को जल्दी आउट करना आसान नहीं होता। कई बार गेंदबाज को एक ही जगह लगातार गेंद डालनी पड़ती है और सही मौके का इंतजार करना पड़ता है।

गांव में कोई किसान खेत में बीज डालकर अगले दिन फसल काटने नहीं पहुंच जाता। उसे मौसम देखना पड़ता है, पानी देना पड़ता है और सही समय का इंतजार करना पड़ता है। टेस्ट क्रिकेट में भी कुछ ऐसा ही है। गेंदबाज को मेहनत करते रहना पड़ता है। कभी विकेट जल्दी मिल जाते हैं और कभी पूरा दिन इंतजार करना पड़ता है। रमेश पोवर का टेस्ट करियर भले ही छोटा रहा, लेकिन भारतीय टेस्ट टीम में जगह मिलना उनके क्रिकेट सफर का एक अहम हिस्सा था। उनके नाम टेस्ट क्रिकेट में 6 विकेट दर्ज हैं

यहां से एक बात समझ आती है हर खिलाड़ी का अंतरराष्ट्रीय कैरियर एक जैसा लंबा नहीं होता। किसी का सफर कई साल चलता है, किसी का कम। मगर उसे खिलाड़ी की पूरी पहचान सिर्फ इस बात से नहीं बनती कि उसने कितने टेस्ट खेले। घरेलू क्रिकेट में उसका योगदान और आगे आने वाली पीडियो के लिए उसका काम भी मायने रखता है।

आईपीएल में भी आजमाई अपनी किस्मत

आज आईपीएल का नाम सुनते ही लाखों के दिमाग में करोड़ों की नीलामी, बड़े-बड़े छक्के और चमकदार मैदान घूमने लगते हैं। लेकिन जब आईपीएल की शुरुआत हुई थी तब यह भारतीय क्रिकेट के लिए एक नया दौर था। रमेश पोवार ने आईपीएल में अभी हिस्सा लिया। वह किंस इलेवन पंजाव और कोच्चि टस्कर्स केरल जैसी टीमों के लिए खेले। उनके आईपीएल करियर में कुल 27 मैच दर्ज हैं।

आईपीएल में खेलना हर खिलाड़ी के लिए एक अलग अनुभव होता है। यहां अलग-अलग देशों के खिलाड़ियों के साथ खेलने, नए तरीके सीखने और दवाव में फैसला लेने का मौका मिलता है। हालांकि रमेश पोवार की पहचान किसी बड़े आईपीएल सुपरस्टार जैसी नहीं बनी, लेकिन उनका करियर हमें याद दिलाता है कि हर खिलाड़ी का योगदान सिर्फ सुर्खियों और विज्ञापनों से नहीं मापा जा सकता।

क्रिकेट की दुनिया में कुछ खिलाड़ी मैदान पर खूब नाम कमाते हैं। कुछ खिलाड़ी घरेलू क्रिकेट में लगातार मेहनत करते हैं और कुछ आगे चलकर कोच बनकर दूसरों को बेहतर खिलाड़ी बनने में जुट जाते हैं। रमेश पोवार की कहानी में यह तीनों पहलू दिखाई देती हैं अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट, घरेलू क्रिकेट और कोचिंग।

जब खिड़की से कोच बनने का सफर शुरू हुआ

अब कहानी का यह हिस्सा बड़ा दिलचस्प है

बहुत से खिलाड़ी मैदान छोड़ने के बाद क्रिकेट से दूर हो जाते हैं। लेकिन कुछ लोगों के लिए क्रिकेट केवल नौकरी या खेलने का काम नहीं होता। खेल उनके जीवन का हिस्सा बन जाता है। रमेश पोवार मैं भी अपने अनुभव को कोचिंग में लगाने का रास्ता चुना। उन्होंने कोचिंग की योग्यता हासिल की और घरेलू क्रिकेट तथा राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी से जुड़े कामों में योगदान दिया।

अब सोचो, जिस खिलाड़ी ने खुद गेंदबाजी करते हुए सैकड़ो विकेट लिए हो, वह युवा गेंदबाजों को सीखने की ज की लाइन कैसे सुधारनी है। बल्लेबाज को कैसे पढ़ना है और दबाव में खुद को कैसे संभालना है। तो उसका अनुभव कितने काम आ सकता है! कोच का काम सिर्फ यह बताना नहीं होता कि गेंद कहां डालनी है। उस खिलाड़ी की कमजोरी पहचाननी पड़ती है, उसका आत्मविश्वास बढ़ना पड़ता है और कभी-कभी गलती पर समझना भी पड़ता है।

भारतीय महिला क्रिकेट टीम के कोच बने रमेश पोवार

अब भैया, कहानी में ऐसा मोड़ आता है जहां रमेश पोवार का नाम फिर से चर्चा में आने लगा साल 2018 में उन्हें भारतीय महिला क्रिकेट टीम का कोच बनाया गया। उनके कार्यकाल में भारतीय महिला टीम ने आईसीसी महिला T20 विश्व कप के सेमीफाइनल तक का सफर तय किया। टीम ने उस दौरान लगातार 14 T20 अंतर्राष्ट्रीय मुकाबले भी जीते।

यह कोई छोटी बात नहीं थी। महिला क्रिकेट उस दौर में तेजी से आगे बढ़ रहा था और भारतीय टीम से उम्मीद भी बढ़ रही थी। रमेश पोवार को खिलाड़ियों के साथ काम करने और टीम को तैयार करने की जिम्मेदारी मिली। कोच के तौर पर उन्हें केवल गेंदबाजी नहीं, बाल की टीम के प्रदर्शन रणनीति और खिलाड़ियों के बीच तालमेल पर भी ध्यान देना था।

लेकिन क्रिकेट में जीत के साथ-साथ मुश्किले भी आती हैं। साल 2018 में उनके कोचिंग कार्यकाल के बाद टीम चैन और वरिष्ठ खिलाड़ी मिताली राज से जुड़े विवाद ने खूब सुर्खियां बटोरी यह मामला उस समय काफी चर्चा में रहा। यहां किसी एक इंसान को पूरी तरह सही या गलत ठहरना ठीक नहीं होगा। टीम खेल में कई बार फेसलों पर मतभेद हो जाते हैं। कोच की अपने रणनीति होती है और खिलाड़ी की अपनी उम्मीद। इन दोनों के बीच तालमेल बनाए रखना भी खेल का अहम हिस्सा है।

गांव की भाषा में समझो एक तरफ कप्तान कह रहा है कि गेद इधर दाल, दूसरी तरफ खिलाड़ी कह रहा है कि उधर डालने से विकेट मिलेगा। अब दोनों में समझदारी और बातचीत जरूरी है, वरना मैच से ज्यादा चर्चा आपसी खींचतान की होने लगती है।

साल 2021 में फिर मिली बड़ी जिम्मेदारी

कहानी यहीं खत्म नहीं हुई

13 मार्च 2021 को बीसीसीआई ने रमेश पोवार को दोबारा भारतीय महिला क्रिकेट टीम का मुख्य कोच नियुक्त किया। इस बार उन्हें नियमित तौर पर टीम की जिम्मेदारी सौंपी गई। अब जरा इस बात पर गौर करना। किसी इंसान के करियर में मुश्किल दौर आ जाए, तो इसका मतलब यह नहीं कि उसके लिए सारे दरवाजे बंद हो गए। रमेश पोवार को फिर मौका मिला। उनके सामने भारतीय महिला क्रिकेट को आगे ले जाने की जिम्मेदारी थी। इस भूमिका में उन्हें अनुभवी खिलाड़ियों और नई प्रतिभाओं दोनों के साथ काम करना था।

साल 2021 में इंग्लैंड दौरे के दौरान भारतीय महिला टीम की ऑलराउंडर स्नेह राणा ने अपने प्रदर्शन से काफी प्रभावित किया। रमेश पोवार ने भी उनके योगदान की तारीफ की थी। कोचिंग का एक बड़ा काम सही समय पर खिलाड़ी को मौका देना और उसकी क्षमता को पहचानना भी है। हालांकि किसी खिलाड़ी की सफलता का पूरा श्रे सिर्फ कोच को नहीं दिया जा सकता। खिलाड़ी की मेहनत, टीम का सहयोग भी जरूरी है।

महिला टीम से आगे राष्ट्रीय क्रिकेट एकेडमी तक

दिसंबर 2022 में बीसीसीआई ने महिला टीम के कोचिंग स्टाफ में बदलाव किया। रमेश पोवार को भारतीय महिला टीम की जिम्मेदारी से हटाकर राष्ट्रीय क्रिकेट एकेडमी ( एनसीए) मैं स्क्रीन गेंदबाजी कोच की भूमिका में भेजा गया। इस तरह उनका अनुभव फिर से गेंदबाजों को तैयार करने के काम आने लगा। अब जरा सोचो, एक युवा स्पिनर एकेडमी में आया है उसे गेंद घुमानी तो आती है, लेकिन सही जगह गेंद डालने में परेशानी होती है।कभी गेंद छोटी पड़ जाती है, कभी ज्यादा फुल हो जाती है और कभी बल्लेबाज आराम से रन बना लेता है।

ऐसे में अनुभवी कोच खिलाड़ी को उसकी गलती समझा सकता है। उसे बता सकता है कि केवल ज्यादा स्पिन करने से काम नहीं चलेगा, गेंद पर नियंत्रण भी जरूरी है। रमेश पोवार का अपना घरेलू रिकॉर्ट बताता है कि उन्हें प्रथम श्रेणी क्रिकेट का लंबा अनुभव रहा है। ऐसे अनुभव का इस्तेमाल नई पीढ़ी के गेंदबाजों को तैयार करने में किया जा सकता है। यही तो क्रिकेट की खूबसूरती है भैया! कल जो खिलाड़ी मैदान पर गेंद फेंकता था आज वही किसी नए खिलाड़ी को गेंदबाजी के गुर सिखा सकता है।

रमेश पोवार की कहानी से क्या सीख मिलती है

अब तब तुमने रमेश पोवार का सफर पड़ा चलो अब इस कहानी से मिलने वाली कुछ जरूरी बातें भी समझ लेते हैं। पहला सबक घरेलू क्रिकेट को कभी छोटा मत समझो। पोवार ने प्रथम श्रेणी क्रिकेट में 470 विकेट लिए। यह आकड़ा बताता है कि लंबे समय तक अच्छा प्रदर्शन करना कितना मायने रखता है।

दूसरा सबक हर खिलाड़ी का सफर अलग होता है। किसी को शुरुआत में ही सफलता मिल जाती है। तो किसी को कई साल मेहनत करनी पड़ती है। हर किसी का कैरियर विराट कोहली या सचिन तेंदुलकर जैसा नहीं होता। इसका मतलब यह नहीं की बाकी खिलाड़ियों का योगदान बेकार है।

तीसरा सबक एक रास्ता बंद हो तो दूसरा रास्ता तलाशो। रमेश पोवार मैं खेलने के बाद कोचिंग में अपनी पहचान बनाई चौथा सबक अनुभव भी एक बड़ी पूंजी है। मैदान पर बिताए गए साल और मैचों से सीखी गई बातें अगली पीढ़ी के खिलाड़ियों को बेहतर बनाने में काम आ सकती है।

रमेश पोवार के करियर के जरूरी आंकड़े

रमेश पोवार के करियर के आंकड़े उन्होंने दो टेस्ट मैच खेले और 6 विकेट लिए 31 वनडे अंतरराष्ट्रीय मैच खेल और 34 विकेट लिए प्रथम श्रेणी क्रिकेट 148 मैच 470 विकेट लिए लिस्ट ए क्रिकेट 113 मैचों में 142 विकेट और आईपीएल के 27 माचो में 13 विकेट लिए

आखरी बात हर खिलाड़ी को स्टार बनने की जरूरत नहीं

तो भैया, यह थी रमेश पोवार की कहानी- मुंबई के घरेलू क्रिकेट से भारत की जर्सी तक, फिर आईपीएल और उसके बाद कोचिंग के दुनिया तक का सफर। वह भारत के लिए बहुत ज्यादा अंतरराष्ट्रीय मैच नहीं खेल भाई लेकिन घरेलू क्रिकेट में उनके 470 प्रथम श्रेणी विकेट अपने नाम में बड़ी उपलब्धि है। महिला क्रिकेट टीम के कोच के तौर पर भी उन्होंने अहम जिम्मेदारी निभाई।

उनकी कहानी पढ़कर यही लगता है कि क्रिकेट में नाम कमाने के कई तरीके हैं कोई बल्लेबाज बनकर दुनिया का दिल जीतता है, कोई गेंदबाज बनकर विकटो की झड़ी लगाता है और कोई कोच बनाकर दूसरे खिलाड़ियों को आगे बढ़ता है। गांव के लड़कों के लिए भी इसमें एक बढ़िया संदेश है। अगर आज तुम्हारे पास महंगा बल्ला नहीं है, अच्छी नहीं है यह खेलने के लिए बडा मैदान नहीं है। तो इसका मतलब यह नहीं है कि तुम्हारा सपना खत्म हो गया। जो साधन है उसे शुरुआत करो खेल सीखो और मेहनत जारी रखो। हां सिर्फ सपना देखने से कुछ नहीं होगा। अभ्यास करना पड़ेगा हार सैनी पड़ेगी और अपनी गलतियां सुधारनी पड़ेगी।

क्योंकि भैया, क्रिकेट हो या जिंदगी हर गेंद पर छक्का नहीं लगता, लेकिन जो खिलाड़ी अगली गेंद खेलने के लिए तैयार रहता है, उसके पास आगे बढ़ने का मौका हमेशा रहता है।

आप लोगों से एक सवाल

आपको क्या लगता है- रमेश पोवार को लोग एक गेंदबाज के रूप में ज्यादा याद रखें या भारतीय महिला क्रिकेट टीम के कोच के रूप में अपना जवाब कमेंट बॉक्स में जरूर दें?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *